Wednesday, January 26, 2011

बस - - - दो पंक्तियाँ - - - - -


बस---दो पंक्तियाँ -----

1
मन का भोजन कामना , मन – मन खा न अघाय |
अमन चैन तब ही मिले, जो मन अमन हो जाय |
2
जीवन अर्थ न अर्थ बस,जीवन- भाव न भाव |
जीवन जीया अभाव में,जो जीवन न भाव |
3
न दी न दी कहते सभी ,पर दानी नदी न रोय |
दीन तो सारा जगत,दीन नदी न होय |
4
लप –लप लप-लप करता हरदम,पल-पल बढ़ता काल |
लपक- लपक सब निगल रहा,आज नही तो काल |
5
करते हुए निस्वार्थ ही,स्व- स्वाभाविक कर्म |
अंत जहाँ सब पंथ का,उस शिखर पहुँचना धर्म |
6
दुर्जन जो स्वभावगत,कभी न सज्जन होय |
चाहे जितनो धोलो कोयलो,कभी न धोलो होय |
7
चाहे संगत साधु की , हरदम क्यों न होय |
मछली पानी में रहे , पर बास कभी न खोय |
8
साधु पारस है तभी , जब दूजो लोहो होय |
जो मति में पत्थर पड्या , सोनो कहाँ से होय |
9
घर-घर-घर-घर घट्टी पीसे , चलती जो हर काल |
घर-घर में घुस पीस रह्यो , पिसवैया सो यह काल |
10
दुख, प्रेम गहरो पेठे , सुख,वासना उथली होय |
गहरो पाये शान्ति , उथल्यो सदा ही  खोय |
11
जल में बैठी मैल सी , मन वृतियां होय |
थोड़ो भी यदि वह हिले , सब मटमैलो होय |
12
काम-वासना सींच कर , मन फल-फूल्यो जाय |
बिन सींचे जब यह फले , तो सच्चो सुख आय |
13
मनन जहाँ वहाँ मन है , मन न जहाँ अ-मन |
जब होवे यह मन अ-मन , वहीं सुख-चैन अमन |
14
जलने की यदि जलन जो , जल से शीतल होय |
मन में दबी घ्रणा-जलन , कभी न ठंडी होय |
15
जब तक था संसार-रस , तन-मन-धन थे सार |
अन्दर जब चेतन जगा , सब कुछ हुआ निस्सार |
16
तेरा दिया हुआ आटा , तेरा दिया हुआ पानी |
तू ही गूथवाता आटा , बनवाता रोटी स्वामी |
17
साधु करता साधना , साधक बन दिन-रात |
साध रहा वह साध्य को , अन्दर जिसका वास |
18
पंडित भय पैदा करे , ले पाप- पुण्य को नाम |
पर निडर-अभय करे , परमेश्वर- भगवान |
19
काम-क्रोध व लोभ से , भरा हुआ इन्सान |
निश्छल-प्रेम,करुणा जहाँ , वहीं बसे भगवान |
20
करे साधु जिसकी साधना , तपसी जिसका तप |
मुनि मनन जिसका करे , वह एकमेव है सच |
21
सेवक मन स्वामी बना , करा रहा सब कर्म |
वश में कर उसे जान के , यही जीवन का मर्म |
22
भटक रहा जो जीव बन , इस संसारी वन |
पार हुआ जो ढूँढ राह , उसने जीया सच्चा जीवन |
23
अस्तित्वहीन अहम्,तम,छाया,बन व्यक्तित्व चहुँ ओर है छाया |
होता अस्तित्व प्रकाशित तब ही,जब मिटे सभी अहम्,तम,छाया|      
24
निस्वार्थ सेवा ही है दान केवल |
बाकी सभी कुछ अहम् स्वार्थ के वश |
25
हर मनका एक कामना , मन का धागा डाल |
मालामाल होने की , फेर रहा है माल |
26
जब करना सब कुछ बन्द हो , होता होना बस |
स्व-स्वरूप को जानना , धर्म है केवल बस |
27
तू मनकों में डोर सा , अंतर्यामी सबमें छुपा |
जिसने खुद को जान लिया , उसने ही जाना खुदा |
28
जब तक शिव होता है जीवन , वरना शव होता है यह तन |
जिसका जान शिव छुटा अहम् , वही शिवम् , वही शिवम् |
29
अपनी जड़े दूसरों में , ढूँढना कहलाती माया |
जिसने उन्हें स्वयं में ढूंढा , उसने ही अनंत पाया |
30
बाहर की सब खोज , व्यर्थ कर्म |
अन्दर स्वयं की खोज , होता है सही धर्म |
31
जो तुझको बाहर ढूंढा , तो सबमें ही तुझको पाया |
जो स्वयं में तुझको खोजा , तो खुद को ही खोया पाया |
32
जो पोषित करे हमारे अहंकार , वे कहलाते हैं संस्कार |
जो सोच के करे वह व्यापर ,जो स्वतः ही हो वही सच्चा प्यार|
 33
जो सांसारिक दलदल से , कमलपत सा बाहर निकलता |
वहीं ब्रह्म की पूर्णता व निर्वाण की शून्यता का कमल खिलता |
34
पा सकते थे जिससे सब कुछ , उस कल्पतरु से जीवन को |
कर संस्कारित बना दिया , एक बोनसाई सा हमने उसको |
35
जैसे होते आपके संस्कार,वैसे आपके आचार,विचार व व्यवहार |
इसमें आपका कुछ भी नहीं , वे तो सब होते जैसे उधार |
36
वह गरीब है जिसके दिल में , चाह और की रहे बनी |
जिसे और की चाह नहीं , वह संतोषी सच्चा धनी |
37
जहाँ-जहाँ मैं-मैं की तूती,वहाँ-वहाँ तू कभी न होता |
जहाँ-जहाँ भी मैं मरता है,वहीं-वहीं तू पैदा होता |
38
जो शासित वे पराधीन , हरदम डर-डर के जीते |
जो अनुशासित वे स्वाधीन , सदा समरस में ही जीते |
39
चित्त खजाना जिसमें भरा , कई जन्मों का  धन |
 भोग रहा जिसे दिन-रात , बन राजा यह मन |
40
मनन जहाँ वहाँ मन है , मन न जहाँ अ-मन |
जब होवे यह मन अ-मन , वहीं सुख-चैन-अमन |
41
मन जल बैठी वृतियाँ , जो निकल न बाहर होय |
मटमैलो सब जल करे , जब भी हलचल होय |
42
साधु करता साधना , साधक बन दिन-रात |
साध रहा उस साध्य को , अन्दर जिसका वास |
43
जिसने अपने चित्त से , त्याग दिया हो जग |
वही है सच्चा सन्यासी , बाकी ढोंगी- ठग |
44
अस्तित्व अन्दर का , तो व्यक्तित्व बाहरिय जीवन |
दोनों जब होते हैं सम , तभी पूर्ण होता है जीवन |
45
अन्दर जो बैठा है चेतन , अहम् है केवल उसकी छाया |
छाया में जो नहीं उलझा , उसने ही बस चेतन पाया |
46
यह जग तो है जैसे सपने , लगते जो सच में ही अपने |
आँख खुली जब तो यह जाना , वे सब झूठे जो थे अपने |
47
जिसने तप से जान अनंत को , किये संताप,द्वन्द सब अंत |
वह संतोषी सत पुरुष , होता सच्चा संत |
48
हम प्रेम-स्वरुप हैं , प्रेम ही है केवल अपना |
दे सकते वह प्रेम ही हम , बाकी सब तो मृगतृष्णा |
49
जिनका सत्य ही हो आधार , वे ही सच में संस्कार |      
बाकी सभी झूठे चोंचले , अहम् ,दिखावा, निस्सार |
50
जो भोला ,निष्काम ,मदरहित , निर्मोही, निष्कपट |
व कभी नहीं होता प्रभु से विभक्त , वही भक्त |
51
हरपल , हरक्षण ,नित्य ही , परिवर्तित होता यह जगत |
इसीलिये वह माया, भ्रम , अनित्य व है असत् |
52
जिसने इस जीवन में ही , जान लिया हो आत्म- तत्व |
उसने जीते जी पाली मुक्ति , उसने ही पाया ब्रह्मत्व |
53
जो बीत गया वह भी कल था , जो आयेगा वह भी कल है |
दोनों कल का संगम यह पल , जीवन- सरिता की कलकल है |
54
जब सब होते हैं साथ-साथ , तो दीवाली होती है |
वरना बस हम होते हैं , और चार-दीवारी होती है |
55
सुख-दुख सभी द्वंदों में, जो रहता सदा सम |
सच्चा सन्यासी कहलाता वही जन |
56
जो इस जग सजग हो जीता |
उसने ही सच में जग जीता |
57
भय होता जैसे पिंजरा इक कारागृह |
जकड़ा है जिसमें मानव जन्म-जन्मांतर |
58
हर मानव में छुपा हुआ , इक कर्म-योगी,ज्ञानी किशन |
एक हाथ में बांसुरी , एक हाथ में चक्र-सुदर्शन |
59
ब्रह्म के पथ जो चले वह ब्रह्मचारी |
फिर अकेला ही चले चाहे साथ नारी |
60
सत का जहाँ संग मिले , वहीं असली सत्संग |
कथा-भागवत मनोरंजक , केवल पुष्पित संग |   
61
सत्-गुरु की लौ जल रही , उसका मिले जो संग |
बुझी हुई बाती जले , वही असली सत्संग |
62
धर्म होता स्वयं को जानने की साधना |
जो सफल होता ,वही पाता परमात्मा |
  63           
भरने का भ्रम देता है धन , जो दिखता है बाहर |
भर सकता जो वह तो बैठा , छुपा हुआ अपने ही अन्दर |
64
मिला भाग्य से जो हमें , वरदान स्वरुप अनुदान |
हम केवल उसके न्यासी , सच्चा मालिक वह भगवान |
65
ट्रक ,ट्रेक्टर, कार, बस , अलग-अलग हैं नाम |
ईधन सब में एक है , सबका एक ही काम |
66
कल-कल करते मूढ़ सब , कल के रुके न काल |
प्रभु-काज तू आज कर , छोड़ मोह-जंजाल |
67
चकोर सो जहाँ प्रेम हो , मकड़ी सो विश्वास |
ईश मिलेगा बस उसे ,  जाकी हर स्वांस उको वास |
68
कस्तूरी के मृग सा , तुझे ढूंढा हर स्थान |
मंदिर ,मस्जिद में नहीं ,मिला अन्दर उसका धाम |
69
ज्यों इत्र का स्पर्श से , कपडो महक्यो जाय |
संत का सत्संग से , जीवन सफल हो जाय |
70
व्यास-पीठ पर बैठ कर , जो माया में ध्यान |
शेर-खाल में गधो है , कहाँ से देगो ज्ञान |
71
द्वारकेशऐसे लोग से , सदा रहो सावधान |
चिकनो,चुपड्यो मुखोटो , बर्बादी तू जान |
72
दिखावा के वास्ते , करे जोड़-तोड़ अनंत |
बगुलो कितनो भगत दिखे , पर मन में भर्यो प्रपंच |
73
अर्थ-व्यवस्था देश की , ट्राफिक सी तू जान |
चमकीली गाड़ी दिखे , पर गढ्ढे ,प्रदुषण ,जाम |
74
प्लास्टिक की थैली से नेता , बगुले से सफेद |
अपने मतलब के लिये , बंजर करें ये देश |
75
भोग लगा ,श्रृंगार कर , करे बहुत उत्सव |
बहुरुपिया सब कुछ करे , पर मिले न कभी केशव |
76
पानी को स्वभाव यह , जिमें राखो वैसो होय |
बर्तन, बर्तन सो दिखे ,खुलो समुन्दर होय |
77
भगवा, तिलक, भभूत से , मिलते नहीं भगवान |
सत्य-वचन ,वैराग्य-मन , परहित ही भगवान |
78
टिक-टिक करती घड़ी चले , रुके न रोके कोय |
जो भी करना अभी कर , काल रुके न कोय |
79
मन तो है इक आइना , चढ़ी प्रपंच की धूल |
सत्कर्मों से पोंछ कर , धूल करो सब दूर |
80


बस कर भी सुनी हैं ,मरघट की बस्तियाँ |
उजड रही जो रोज ही ,चहक रही वे बस्तियाँ |
81
जनम से रोज ही ,मर रहा शरीर यह |
जनम यदि बीजतो ,मरण उसका है फल |
82
जन्म से मृत्यु तक का ,मृत्युधर्मा यह सफ़र |
शरीर नित्य मर रहा ,जीवन अव्यक्त ,अव्यय ,अमर |   
83
हर पल, हर क्षण मर-मर कर ,घट रहा यह जीवन |
मरघट का डर फिर भी हर घट ,सता रहा हर पल जीवन |
84
जन्म से मृत्यु तक का ,वृक्ष सा जीवन- सफ़र |
जन्म बीज ,बढ़ जो देता ,मृत्युरुपी कर्म-फल |
८५
मन के घोड़े बेलगाम ,स्वछन्द ही चहुँ ओर दौड़ते |
जो लगा लगाम इन्हें वश में करते ,जीवन रहस्य वे ही खोलते |
८६
अब तक जो सतही था ,महज एक आकर्षण |
जैसे-जैसे उम्र बड़ी ,गहराया प्यार का रंग |
८७
प्यार किसी खास उम्र का गुलाम नहीं होता |
ये वो नगमा है जो किसी साज का मोहताज नहीं होता |
८८
भरा हुआ है कूड़ा-कड़कट ,मेरे मन-आँगन में |
मैं ढूंढ रहा सतगुरु-बुहारी ,जो दूर करे इसे पलभर में |
८९
मूर्ति-पूजा को तब ही सफल समझो |
जब पत्थर में भी दिखने लगे भगवान हमको |


९०

तुम्हें देख मन मुदित हुआ, और हो गई आँखें बन्द |

कैसा प्यारा वह अद्भुत क्षण |

९१

सोने के स्तूप में, सन्यासियों का जमघट |

कर रहा है तप, यह दुनिया बड़ी गजब |

९२

सुख परछाई सा आगे-आगे, यदि हम उसके पीछे दौडें |

हम आगे वह पीछे-पीछे, यदि हम उससे मुँह मोड़ें |

९३

घृणा की आग की इक चिनगारी, कई घर जला गई |

प्यार की बस इक बूँद, कईयों की प्यास बुझा गई |

९४

जब टूट जाता है, मेरे अपने होने का भरम |

तभी पैदा होता है, तू और तेरा करम |

९५

जब शून्य हो जाता है, मैं व मेरे का अहम् |

तभी जान पाता है कोई, तेरा मरम |

९६

दूसरों को जानने में लगे हैं हम सभी |

यह और बात है कि हमें खुद का पता नहीं |

९७

भूत-भविष्य में जीना ही कहलाता भय |

जो आज अभी में जीता, वही है निर्भय |

९८

जिन्दगी उन्मुक्त हँसने का नाम है |

तुम्हें हँसना ही न आया तो मैं क्या करूँ |

९९

आज परिजन रहते घर में, जैसे पर-जन |

क्योंकि सबके अन्दर रहता, अपना-अपना अहम् |

१००

जो सदा अव्यक्त ही रहता, वह सच ही है ब्रह्म |

बाकी सभी जो दीखता, वह माया एक भ्रम |

१०१

रिश्तों कि ऊँची दुकान के, सब पकवान फीके हैं |

ऊपर से जो रसीले दीखते, अन्दर से सूखे हैं |

१०२

धन-दौलत की चौंधियाहट में, रिश्ते गुम हो गए |

प्यार के सब उजाले, अँधेरे हो गए |

१०३

शून्य हो जाता है, जब सारा संसार |

तभी जान सकता कोई, पूर्ण का सार |

१०४

दिमाग से बने सम्बन्ध, बस मुखौटे होते हैं |

जो बिना सोचे-समझे दिल से बनते, वे ही ताजमहल होते हैं |

१०५

ऊपर से ढोलक से संगीतमयी, मगर अन्दर से खोखले |

जो कलदार से सदा ही खनके, वे प्यार के रिश्ते ही असली खरे|

१०६

दिमाग से बने सम्बन्ध तो, बनावटी, बहुरूपिये होते हैं |

मगर दिल से बने प्यार के रिश्ते तो, खरे सिक्के होते हैं |

१०७

खुद को खोया तो ये जाना, ऐ !खुदा |

सिर्फ़ बन्दगी, आशिकी नहीं होती |

१०८

पैसों की खनखन का स्वर, बस शोर-तमाशा होता है |

जो दिल के साज से निकले, वही बस प्यार होता है |

१०९

मन में विचारों का तूफ़ान उठा रहता है |

सुना है तू उसके पार छुपा होता है |  

११०

संसार दरिया, जीवन इक कश्ती |

जो मन माझी, तो डूबेगी कश्ती |

१११

मन---विचार---द्वन्द---उलझन---बैचेनी---दुःख |

अ-मन---निर्विचार---निर्द्वंद---सरल---प्रसन्न---सुख |

११२

जो सत्य से कराते साक्षात्कार, वे सुसंस्कार |

बाकी सब दिखावटी, बनावटी, एकदम बेकार |

११३

जब तक साँस चले यह जीवन,वरना मृत कहलाता यह तन |

पर दो साँसों के बीच जो मृत पल, वही केवल अमृत जीवन |

११४

प्यार में हद हुआ नहीं करती,

जहाँ हद होती है वहाँ प्यार नहीं होता |

११५

मुद्दत के बाद उनको जो देखा गली में फिर से,

दिल के सभी घाव हरे हो गए |

११६

मेरी हार में ही मेरे जीत की शुरुवात है,

मेरी हार ही तुझ तक पहुँचने का मार्ग है |

११७

तेरे थिरकते लबों ने कह दिया सब कुछ,

या खुदा [संगदिल] हम ही नासमझ निकले |

११८

उनके लबों में कई समुन्दर भरे पड़े,

हम किनारे ही बैठे रहे डूबने के डर से |

[हमें पीना ही न आया तो खुदा क्या करे ]

११९

तेरे लबों पे थोड़ी सी मुस्कान क्या थिरकी,

बे मौसम ही हर तरफ बहार छा गई |

१२०

बिन पीये ही देख जिसे बहक उठे हम,

तेरे लबों में न जाने कितना नशा भरा हुआ |

१२१

वे प्यार के लब्ज भी हैं मेरी नफरत के हकदार,

जो तेरे लबों को चूम मुझ तक पहुँचते हैं |

१२२

गुलाबी तेरे लब, गुलाबी मेरी रंगत,

आओ हम प्यार की होली खेलें |

१२३

थिरकते हुए लब कह जाते सारी दास्ताँ,

जब लब्ज नहीं कर पाते भावों को बयाँ |

१२४

  

    



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